कांग्रेस के खेवनहार राहुल गांधी

कांग्रेस के खेवनहार राहुल गांधी

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कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को देर सवेर कांग्रेस अध्यक्ष बनना ही था. उनकी ताजपोशी की औपचारिकता महज वक्त की बात थी. हर कोई जानता था कि राहुल गांधी ही एक दिन कांग्रेस की कमान संभालेंगे. लेकिन इसके बावजूद जब राहुल के राज्याभिषेक की चर्चा उठी तो इस बात को मीडिया में खासी तवज्जो मिली.टीवी चैनलों पर तो राहुल की ताजपोशी को लेकर नॉन स्टॉप कवरेज हो रही है. 47 साल के राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष बनने को लेकर कई लोगों ने जहां उनका समर्थन किया.

राहुल अब जननेता के तौर पर सामने आए हैं. ऐसे में राहुल अगर कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर कामयाब होते हैं, तो उससे न सिर्फ पार्टी अपना खोया हुआ गौरव दोबारा हासिल कर सकेगी, बल्कि इससे लोकतंत्र का भी भला होगा

 

 

राज्य दर राज्य बीजेपी के हाथों मिल रही शिकस्त से कांग्रेस के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो चुका है. ऐसे में कांग्रेस को पतन से बचाने के लिए राहुल गांधी ही आखिरी उम्मीद हैं. दरअसल कांग्रेस का पतन मई 2014 में मोदी लहर के साथ शुरू हुआ था. केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद कांग्रेस एक के बाद एक कई राज्यों में भी सत्ता से बाहर होती गई.

 

राहुल हैं कांग्रेस के उद्धारक?

अब अरसे बाद कांग्रेस कार्यकर्ता राहुल को पार्टी के उद्धारक के रुप में देख रहे हैं. कांग्रेस कार्यकर्ताओं को लगता है कि राहुल की नीतियां और कोशिशें दम तोड़ती पार्टी में नई जान फूंक सकती हैं. कार्यकर्ताओं को ये भी उम्मीद है कि, राहुल पार्टी के ढांचे में बड़े बदलाव करेंगे और नए चेहरों को मौका देंगे, जिससे पार्टी का जनाधार बढ़ाने में खासी मदद मिलेगी.बेशक, कांग्रेस के लिए ये बेहद जरूरी है कि वो न सिर्फ अपना जनाधार बढ़ाए बल्कि देश की जनता का विश्वास भी दोबारा हासिल करे. साल 2014 के लोकसभा चुनावों में करारी हार ने कांग्रेस की चूलें हिलाकर रख दी थीं. तब पार्टी को महज 44 सीटें ही हासिल हुई थीं. मतलब साफ है कि कांग्रेस ने जनता का विश्वास लगभग पूरी तरह से खो दिया था. जनता के उसी विश्वास को दोबारा पाना ही कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

 

फिलहाल राहुल के साथ एक सकारात्मक बात यह है कि उन्होंने अपने सियासी करियर को धीमे-धीमे लेकिन मजबूती के साथ संवारा है. राहुल ने खुद को एक ऐसे राजनेता के रूप में पेश किया है, जो आम आदमी की बात करता है. जननेता की छवि के चलते राहुल को अपने कद के किसी और नेता के मुकाबले मीडिया की कहीं ज्यादा तवज्जो मिल रही है.

 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राहुल गांधी एक ऐसे नेता के तौर पर सामने आए हैं, जो जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर है. जबकि राहुल के कई विरोधियों की जीत का मंत्र जाति और धर्म की राजनीति ही है. राहुल की सियासी सोच और उनकी नीतियां देश के धार्मिक अल्पसंख्यकों में सुरक्षा की भावना पैदा करती हैं. जबकि दक्षिणपंथी आंदोलन और कट्टर हिंदुत्व के चलते अल्पसंख्यक वर्ग अरसे से डरा-सहमा हुआ है क्योंकि कट्टरपंथी हिंदुत्व के झंडाबरदार अब यह तय करने में भी जुट गए हैं कि कौन क्या खाएगा और कौन क्या बोलेगा. यानी लोगों से अब मनमाफिक खाने-पीने और बोलने की आजादी भी छीनी जा रही है. ऐसे में राहुल गांधी अल्पसंख्यकों के लिए धार्मिक विश्वासों और व्यक्तिगत आजादी के मसीहा बनकर उभरे हैं.राहुल गांधी अगर अपने बहुलवादी राजनीतिक दृष्टिकोण पर मजबूती के साथ डटे रहे तो, वह देश के तटस्थ वोट बैंक के अंतिम नायक (लास्ट हीरो) के तौर पर अपनी नई पहचान भी बना सकते हैं. दूसरी बात यह है कि, राहुल ने शुरुआत से ही खुद को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया है, जो कांग्रेस पार्टी के पारिस्थितिकी तंत्र से बाहर है. य

राहुल अब खुद को भ्रष्टाचार से परे, ईमानदार और गरीबों के हमदर्द, एक ऐसे नेता के रूप में पेश करते हैं, जो समाज के दबे-कुचले लोगों की भलाई के लिए काम करना चाहता है.

राहुल का आरोप है कि मोदी सरकार सिर्फ बड़े उद्योगपतियों पर ही मेहरबान है, उसे देश के गरीब जनता की कोई चिंता ही नहीं है.गलतियों को स्वीकार करके बढ़ा जा सकता है आगेराहुल गांधी अगर पूरे साहस के साथ ये स्वीकार कर लें कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार से न सिर्फ कई नीतिगत और राजनीतिक गलतियां हुईं, बल्कि कई मोर्चों पर सरकार अक्षम भी साबित हुई, तब राहुल शायद छिन्न-भिन्न हालत में पड़ी कांग्रेस की मरम्मत कर सकते हैं. राहुल की पेशकदमी के बिना कांग्रेस फिर से सियासी दौड़ में कामयाब नहीं हो सकती है

 

 

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अगर राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस मजबूत होगी तो उससे लोकतंत्र का फायदा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जब से कांग्रेस का पतन शुरू हुआ, तब से केंद्र की शक्तिशाली मोदी सरकार के फैसलों और नीतियों पर सवाल पूछ सकने वाले राजनीतिक विपक्ष का सर्वथा अभाव है. जो कि एक लोकतंत्र के लिए बुरा संकेत है. लिहाजा ऐसा देखा गया है कि, मजबूत विपक्ष के अभाव में अक्सर मीडिया उसकी भूमिका निभा रही है.’ब्रैंड-न्यू’ गांधी यानी नए-नवेले राहुल गांधी को अब जनता और राजनीतिक विरोधी गंभीरता से लेने लगे हैं. अतीत की अपनी छवि से छुटकारा पाकर राहुल अब जननेता के तौर पर सामने आए हैं. ऐसे में राहुल अगर कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर कामयाब होते हैं, तो उससे न सिर्फ पार्टी अपना खोया हुआ गौरव दोबारा हासिल कर सकेगी, बल्कि इससे लोकतंत्र का भी भला होगा।